गैर दोस्ताना, एकतरफा और... अमेरिका के 100% टैरिफ के जवाब में रूस, चीन और भारत ने क्या कहा?
रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव अब एक नए मुकाम पर पहुंच गया है. अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने बुधवार को ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ को 262-159 वोटों से पास कर दिया. इस कानून का सहारा लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति रूसी तेल खरीदने पर भारत और चीन पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगा सकते हैं.
इस कानून से प्रभावित होने वाले तीन अहम देश भारत-चीन और रूस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. भारत ने कहा है कि उसके लिए अपने नागरिकों की एनर्जी सिक्योरिटी पहली प्राथमिकता है. बीजिंग ने कहा कि अमेरिका का ये कदम ‘लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन’ है जिसको अंतरराष्ट्रीय कानून या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनुमति नहीं मिली है. वहीं कच्चा तेल बेचने वाले रूस ने इसे 'गैर दोस्ताना' कदम बताया है.
इस तरह से तीनों ही देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकी दबाव के सामने झुकने का प्रश्न नहीं है.
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पास यह कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस की ऊर्जा और रक्षा अर्थव्यवस्था पर नए प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस से तेल या गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति देता है. सीनेट अगस्त में ही इसे 86-11 के बहुमत से पास कर चुका है. अब अगला कदम ट्रंप के हस्ताक्षर का है.
अमेरिका से पास इस कानून पर भारत ने स्पष्ट, सधी और दो टूक प्रतिक्रिया दी.
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और आगे भी अलग-अलग स्रोतों से, बाजार की बदलती परिस्थितियों के आधार पर ऊर्जा खरीद जारी रखेगा. मंत्रालय ने यह भी कहा कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर बातचीत हुई है और भारत ने द्विपक्षीय संबंधों तथा वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित असर को स्पष्ट रूप से अमेरिका के सामने रखा है.
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने भारत की प्रतिक्रिया को और स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया. उन्होंने एक्स पर लिखा कि भारत की प्राथमिकता पीपुल्स फर्स्ट की है.
क्वात्रा ने 'X' पर एक पोस्ट में कहा, "भारत के लोगों की एनर्जी सिक्योरिटी सबसे पहले है. हमारे फैसले उपलब्धता, किफायती दाम, बाजार की स्थितियों और कमर्शियल व्यवहार्यता से तय होते हैं."
अमेरिका को स्पष्ट संदेश देते हुए भारतीय राजदूत ने कहा, "हमारी सोर्सिंग एक बुनियादी राष्ट्रीय जिम्मेदारी को दर्शाती है: अपने लोगों के लिए पर्याप्त, किफायती और बिना रुकावट वाली एनर्जी सुनिश्चित करने के लिए अपनी सीमाओं से बाहर देखना."
उन्होंने कहा, "भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है और एनर्जी का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है. फिर भी, एक औसत भारतीय ग्लोबल औसत का एक-तिहाई से भी कम और औसत अमेरिकी का दसवां हिस्सा ही एनर्जी की खपत करता है. हमारी एनर्जी की जरूरतें बढ़ेंगी और बढ़नी भी चाहिए."
भारतीय राजदूत ने कहा कि भरोसेमंद और किफायती सप्लाई से घर, खेत, अस्पताल, स्कूल, कारखाने और ट्रांसपोर्ट चलते हैं; इससे लोगों की आजीविका सुरक्षित रहती है और विकास जारी रहता है.
बता दें कि ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव थिंक टैंक के अनुसार भारत ने मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में 40.8 अरब डॉलर का रूसी कच्चा तेल आयात किया था. ये उसके कुल कच्चे तेल इम्पोर्ट का लगभग 30.3% था.
चीन ने इस मामले में अमेरिका को दुनिया के कानून कायदे याद दिलाए. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन दूसरे देशों के साथ समानता और पारस्परिक लाभ के आधार पर व्यापार करता है और इस सहयोग में किसी तीसरे देश को दखल या दबाव नहीं डालना चाहिए. बीजिंग ने अमेरिकी कदम को ऐसी ‘लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन’ बताया जिसका अंतरराष्ट्रीय कानून या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति से आधार नहीं है.
बीजिंग ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने रूस के साथ सामान्य व्यापारिक रिश्तों को किसी तीसरे देश के दबाव में बदलने के पक्ष में नहीं है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने रूस के साथ व्यापारिक संबंधों की पैरवी करते हुए कहा, "इस तरह के सहयोग का मकसद किसी तीसरे पक्ष को टारगेट करना नहीं है और यह किसी तीसरे पक्ष की रुकावट या दबाव से मुक्त होगा. चीन लंबे अधिकार क्षेत्र और एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है, जिनका अंतर्राष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है और जिनके पास UN सिक्योरिटी काउंसिल का अधिकार नहीं है."
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल चीन का रूस से तेल और गैस का आयात 64 अरब अमेरिकी डॉलर का था, और इस साल जनवरी से अगस्त के बीच यह आयात 70 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा हो गया.
मॉस्को ने भी अमेरिकी कदम पर प्रतिक्रिया दी है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि अगर नए अमेरिकी प्रतिबंध लागू होते हैं तो इससे यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए चल रहे प्रयास और मुश्किल हो सकते हैं. रूस ने अमेरिकी प्रतिबंधों को ‘अनफ्रेंडली’ कार्रवाई की श्रेणी में बताया है. क्रेमलिन का कहना है कि अतिरिक्त प्रतिबंध शांति समझौते तक पहुंचने की कोशिशों को आसान नहीं, बल्कि और जटिल बनाएंगे.
रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने कहा कि अमेरिका की टैरिफ डिप्लोमेसी तब लागू होती है जब कोई अपनी बात मनवाने की कोशिश करता है तो अमेरिका तुरंत टैरिफ लागू कर देता है, बस यही उनकी डिप्लोमेसी है.
भारत, रूस और चीन की नजरें अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर टिकी हैं. क्योंकि टैरिफ से जुड़ा फैसला राष्ट्रपति को ही लेना है.


