कॉलेज नहीं 'काबिलियत' रंग लाई! कहानी 3 छात्रों की, जिनकी डिग्री से पहले होने लगी कमाई
अनुराग रजनी कुजूर के लिए पहली सैलरी केवल बैंक खाते में जमा हुई रकम नहीं थी. यह उनके लिए अपनी मां को डिनर पर लेकर जाने और उन्हें साड़ी खरीदकर देने की खुशी का मौका था. अंशु सागर के लिए पढ़ाई के साथ कमाई करने का मतलब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना था.
इससे वह वकील बनने के अपने लंबे समय के लक्ष्य को छोड़े बिना आगे बढ़ सकते थे. वहीं, 19 साल के राज कुमार ने 12वीं के बाद करीब एक साल यह सोचने में बिताया कि आगे क्या करना है.
12वीं के बाद हर छात्र के लिए कॉलेज और पारंपरिक डिग्री ही करियर का एकमात्र रास्ता नहीं है. कुछ युवाओं ने शॉर्ट टर्म वोकेशनल कोर्स का रास्ता चुना और पढ़ाई के साथ-साथ काम का अनुभव हासिल करते हुए कमाई भी शुरू कर दी. तीन युवाओं की कहानी बताती है कि अगर सही स्किल और ट्रेनिंग मिल जाए तो करियर की शुरुआत डिग्री पूरी होने से पहले भी की जा सकती है. इन तीनों ने अलग-अलग परिस्थितियों में स्किल आधारित कोर्स किए, इंटर्नशिप शुरू की और हर महीने 14 हजार से 18 हजार रुपये तक की स्टाइपेंड मिल रहा है.
अनुराग राजनी कुजूर की कहानी बाकी दोनों छात्रों से अलग है. वह अपनी मां के दिल्ली में काम करने की वजह से अपने नाना-नानी के वहां पली-बढ़ीं. 10वीं की बोर्ड परीक्षा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. इसके कारण वह अपनी बोर्ड परीक्षा पूरी नहीं कर सकीं. हालांकि उन्होंने पढ़ाई छोड़ने के बजाय बाद में ओपन स्कूलिंग के जरिए 10वीं की परीक्षा पास की और अपनी पढ़ाई जारी रखी.
अनुराग का लक्ष्य शुरू से ही हेल्थकेयर सेक्टर में जाने का था. दिल्ली आने के बाद उन्होंने BSc Nursing करने की दिशा में कदम बढ़ाया और इसके साथ General Duty Assistant (GDA) प्रोग्राम में भी एडमिशन ले लिया. ट्रेनिंग के दौरान एक हेल्थ कैंप ने उनके करियर के फैसले को और मजबूत किया. Nurses Day के मौके पर आयोजित हेल्थ कैंप में उन्होंने मरीजों का रजिस्ट्रेशन किया, उनके जरूरी स्वास्थ्य मानकों को रिकॉर्ड किया और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की मदद की. इस अनुभव से उन्हें अस्पताल में काम करने की वास्तविक समझ मिली.
इसके बाद उन्हें मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में इंटर्नशिप मिली. वह अस्पताल के Endoscopy Department में काम कर रही हैं और मेडिकल टीम को सपोर्ट करती हैं. अनुराग को पहली बार 14 हजार रुपये का स्टाइपेंड मिला. उनकी मां घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती हैं. पहली कमाई मिलने पर अनुराग ने अपनी मां और परिवार को डिनर पर ले जाकर खुशी साझा की और मां को साड़ी भी गिफ्ट की. जिस युवा ने कभी अस्पताल में भर्ती होने के कारण बोर्ड परीक्षा गंवाई थी, उसके लिए अस्पताल में काम करना एक खास उपलब्धि बन गया. अब उनका लक्ष्य क्वालिफाइड नर्स बनना और अपने परिवार को आर्थिक रूप से सपोर्ट करना है.
दूसरे छात्र अंशु सागर के सामने आर्थिक चुनौती थी. उनके माता-पिता ने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की. अंशु अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते थे और साथ ही आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बनना चाहते थे. उन्होंने रिटेल मैनेजमेंट का कोर्स किया. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें लाइस्टाइल में इंटर्नशिप मिली, जहां उन्हें हर महीने 18 हजार रुपये का स्टाइपेंड मिलता है.
रिटेल की क्लासरूम ट्रेनिंग ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया. वहीं, ग्राहकों के साथ काम करने से उन्हें काम का अनुभव भी मिला. इंटर्नशिप के दौरान उन्होंने कई सारी स्किल सीखीं. अंशु का लक्ष्य रिटेल में लंबे समय तक काम करना नहीं, बल्कि आगे LLB की पढ़ाई कर वकील बनना है. ग्राहकों के साथ काम करने के अनुभव ने उन्हें धैर्य रखना, लोगों की बात ध्यान से सुनना और अलग-अलग तरह के लोगों से संवाद करना सिखाया है. उनका मानना है कि भविष्य में वकील बनने पर ये स्किल क्लाइंट को समझने और कठिन परिस्थितियों को संभालने में काम आएंगी.
हालांकि, अंशु की पहली कमाई उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाया. उन्होंने अपने स्टाइपेंड का कुछ हिस्सा अपनी जरूरतों पर खर्च किया और परिवार की आर्थिक मदद के लिए भी योगदान दिया. उनके लिए यह इंटर्नशिप मंजिल नहीं, बल्कि उस बड़े लक्ष्य तक पहुंचने का जरिया है जिसे उन्होंने अपने लिए तय किया है.
इसके बाद 19 साल के राज कुमार 12वीं के बाद कॉलेज करने को लेकर दुविधा में थे. उन्हें समझ में नहीं आ पा रहा था कि वह कॉलेज में एडमिशन ले या नहीं. इसके बाद से उन्होंने एक साल घर पर ही गुजारा. वह ऐसा विकल्प चाहते थे जिसमें उन्हें व्यावहारिक अनुभव मिले और करियर की शुरुआत की जा सके. इसके बाद उन्होंने हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट में सर्टिफिकेट कोर्स में एडमिशन लिया.
इसकी ट्रेनिंग के दौरान उन्हें ग्राहकों की सेवा, कॉफी बनाना, ग्राहकों से व्यवहार करना और बातचीत करने जैसी जरूरी स्किल सिखाई गईं. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद राज को Bakingo में Barista के तौर पर इंटर्नशिप मिली. यहां उन्हें हर महीने 14 हजार रुपये का स्टाइपेंड मिल रहा है. काम के पहले दिन उनके लिए उत्साह और घबराहट दोनों से भरा था. नए सहकर्मियों से मिलना, वर्कप्लेस के नियम समझना और नए माहौल में काम करना उनके लिए नया अनुभव था.
अनुराग, अंशु और राज की कहानी 12वीं के बाद युवाओं के सामने आने वाले एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है और उनके परेशानियों को उजागर करती है. अगर पारंपरिक कॉलेज की राह तुरंत संभव न हो, पसंद न हो या करियर को लेकर स्पष्टता न हो तो क्या किया जाए? ऐसी स्थिति में शॉर्ट टर्म स्किल कोर्स एक विकल्प हो सकते हैं. इनसे छात्र कम समय में किसी खास क्षेत्र की व्यावहारिक ट्रेनिंग लेकर वर्कप्लेस में प्रवेश कर सकते हैं और साथ-साथ आगे की पढ़ाई भी जारी रख सकते हैं.
Monica Sarin Foundation के अनुसार अब तक 301 छात्र इन प्रोग्राम को पूरा कर चुके हैं, जबकि संस्था के मुताबिक इनकी प्लेसमेंट दर 95 प्रतिशत रही है. ये तीन महीने के कोर्स 12वीं पास और 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के युवाओं के लिए उपलब्ध हैं. हॉस्पिटैलिटी और हेल्थकेयर ऐसे सेक्टर हैं जहां इन प्रशिक्षित युवाओं के लिए सबसे ज्यादा हायरिंग देखी गई है. संस्था के मुताबिक इन कोर्स के बाद मिलने वाला औसत स्टाइपेंड 15 हजार से 18 हजार रुपये प्रति माह के बीच रहता है.


