भारत को हर साल चाहिए 36-40 फाइटर जेट, चीन-PAK से चिंता... वायु सेना प्रमुख की चेतावनी
भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने शनिवार को अपने सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में लड़ाकू स्क्वॉड्रनों की गिरती ताकत पर गंभीर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि वायु सेना को हर साल 36 से 40 विमान यानी करीब दो स्क्वॉड्रन के बराबर विमान शामिल करने होंगे ताकि संख्या और न गिरे. इसके बाद और तेज गति से इंडक्शन करके ताकत बढ़ाने की जरूरत है.
एयर फोर्स डे से पहले सिंह ने साफ कहा कि रक्षा कार्यक्रमों में देरी सीधे ऑपरेशनल क्षमता को नुकसान पहुंचाती है. उन्होंने बार-बार दोहराया कि 'टेक्नोलॉजी में देरी का मतलब है टेक्नोलॉजी से इनकार'. अगर विकास और उत्पादन इतना लंबा खिंच जाए कि दुश्मन आगे निकल जाए तो तकनीक अपना महत्व खो देती है.
स्क्वॉड्रन की कमी को पूरा करने के लिए एयर चीफ ने कई कार्यक्रमों का जिक्र किया. इनमें तेजस मार्क-1ए, तेजस मार्क-2, 114 विमानों वाला प्रस्तावित एमआरएफए कार्यक्रम और पांचवीं पीढ़ी का एएमसीए शामिल हैं. उन्होंने कहा कि अगर एएमसीए या अन्य कार्यक्रमों में देरी होती है तो ऑप्शनल लड़ाकू जेट देखने पड़ सकते हैं.
रूस के सु-57 ऑफर पर कोई फैसला नहीं लिया गया है. अगर सभी कार्यक्रम योजना के अनुसार आगे बढ़े तो उत्पादन की रफ्तार जरूरी स्तर तक पहुंच सकती है. एचएएल हर साल 24 से अधिक विमान बनाने की दिशा में काम कर रहा है. एमआरएफए कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने पर आवश्यक इंडक्शन रेट हासिल करने में मदद मिलेगी. कम संख्या के बावजूद वायु सेना अपनी ऑपरेशनल क्षमता को लेकर सहज है क्योंकि खरीद प्रक्रिया चल रही है.
थिएटर कमांड के मुद्दे पर एयर चीफ ने स्पष्ट किया कि भारतीय वायु सेना इसके खिलाफ नहीं है. लेकिन संरचना और क्रियान्वयन के क्रम को सावधानी से जांचना जरूरी है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद मिले प्रत्यक्ष अनुभवों ने चर्चा की दिशा बदल दी है. अब नए चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के गठन के बाद इस मुद्दे पर फिर से विचार होगा.
यह भी देखा जाएगा कि इसे एक साथ लागू करें या चरणबद्ध तरीके से. सैन्य नेतृत्व विकल्प सरकार के सामने रखेगा. उद्देश्य यह होना चाहिए कि संरचना ऑपरेशनल दृष्टि से प्रभावी साबित हो. पाकिस्तान और चीन के बीच पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर सहयोग को एयर चीफ ने चिंता का विषय बताया. लेकिन उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इन प्लेटफॉर्म से पूरा फायदा नहीं उठा पा रहा क्योंकि इन्हें अपनी समग्र युद्ध प्रणाली में अच्छी तरह एकीकृत नहीं कर पाया है.
सिर्फ विमान नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क में उसका समन्वय ही उसकी प्रभावशीलता तय करता है. फ्लाईदुबई घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए उन्होंने भारतीय पायलट के साहस की सराहना की और कहा कि वायु सेना उन पर गर्व करती है. जवाबदेही के बारे में उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं है.
पिछले दो साल की उपलब्धियां सामूहिक प्रयास हैं और जो नहीं हो पाया उसकी जिम्मेदारी लेने को वे तैयार हैं. अंतरिक्ष क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने, ऑपरेशनों के समर्थन और स्पेस हथियारों पर काम शुरू हो चुका है.
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एयर चीफ के बयान वायु सेना की सबसे बड़ी चुनौती को रेखांकित करते हैं. एक तरफ संख्या तेजी से बढ़ानी है तो दूसरी तरफ स्वदेशी और आधुनिक बेड़े की ओर संक्रमण भी करना है. देरी से बचना और उत्पादन रफ्तार बढ़ाना दोनों जरूरी हैं. अगर कार्यक्रम समय पर पूरे हुए तो वायु सेना न सिर्फ मौजूदा अंतर को पाट सकेगी बल्कि भविष्य की जरूरतों के लिए तैयार हो जाएगी. यह वार्ता साफ संकेत देती है कि वायु सेना अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए व्यावहारिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ रही है.


