Asian Games: सिंधु का दर्द… रात 3 बजे बिस्तर, सुबह 8:30 बजे कोर्ट, शरीर थका तो कैसे आती पूरी ताकत?
रात के तीन बजे कमरे में वापसी. आंखों में नींद और शरीर में थकान. अभी आराम भी पूरा नहीं हुआ था कि सुबह 8:30 बजे फिर कोर्ट पर उतरने की तैयारी. 18 घंटे के भीतर तीन मुकाबले. ऐसे कठिन कार्यक्रम के बीच पीवी सिंधु ने एशियन गेम्स में अपना सबकुछ झोंक दिया, लेकिन क्वार्टर फाइनल में चीन की चेन यूफेई के खिलाफ बाजी उनके हाथ से निकल गई.
दो बार की ओलंपिक पदक विजेता सिंधु ने पहला गेम 21-11 से अपने नाम करके मुकाबले में शानदार शुरुआत की. चेन ने दूसरे गेम में वापसी की और 21-18 से जीत दर्ज कर स्कोर बराबर कर दिया. निर्णायक गेम में चीनी खिलाड़ी ने 21-10 से बाजी मार ली और सिंधु का एशियन गेम्स अभियान क्वार्टर फाइनल में खत्म हो गया.
हार के बाद सिंधु के लिए सबसे ज्यादा तकलीफ उस मुकाबले को लेकर थी, जिसे वह अपने पक्ष में खत्म कर सकती थीं. निर्णायक पलों में मैच उनके हाथ में था, लेकिन मौका निकल गया.
सिंधु ने कहा, 'मुझे इसे शब्दों में ढालने के लिए थोड़ा समय चाहिए था. मेरा एशियन गेम्स अभियान खत्म हो गया है और मैं दुखी हूं. क्वार्टर फाइनल में मेरे पास मैच खत्म करने का मौका था. मैं बार-बार उन्हीं तीन अंकों के बारे में सोच रही हूं.'
उन्होंने यह भी माना कि अहम मौकों पर लंबी और थका देने वाली रैलियों का असर पड़ा. हालिया चीन अभियान में भी निर्णायक पलों में ऐसी ही स्थिति सामने आई थी.
I needed a little time to put this into words. My Asian Games campaign is over, and I’m hurting. Three points from closing out that quarterfinal. I keep coming back to those three points. Like in China, long, demanding rallies at the most critical moments turned the match. I had… pic.twitter.com/xD2IBNWyQi
'मेरे पास मौका था... उसे गंवाना दुख देता है'
लेकिन सिंधु इस हार को अपने सफर की पहचान नहीं बनने देना चाहतीं. दर्द अभी ताजा है, मगर नजरें आगे की तरफ हैं. वह जानती हैं कि दबाव के उन पलों में कहां सुधार की जरूरत है और उनकी टीम ने उस पर काम भी शुरू कर दिया है.
उन्होंने कहा, 'मैं और मेरी टीम पहले से ही उन पलों में मैच को बेहतर तरीके से खत्म करने पर काम कर रहे हैं. हम इसे ठीक करेंगे.'
सिंधु के लिए यह एशियन गेम्स सिर्फ एक और टूर्नामेंट नहीं था. 2014 में पहली बार एशियन गेम्स में उतरने के बाद यह उनका चौथा अभियान था. 12 साल के इस सफर में उन्होंने भारत के लिए कोर्ट पर अनगिनत मुकाबले खेले हैं और कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं.
इसीलिए सिंधु नहीं चाहतीं कि एक दर्दनाक नतीजा उनके पूरे सफर पर भारी पड़ जाए.
उन्होंने लिखा, 'पहले गर्व करने की भी जगह है. 2014 में अपने पहले एशियन गेम्स से लेकर अब चौथे गेम्स तक, 12 साल भारत के लिए अपना सबकुछ देने के. मैं खुद को इसे महसूस करने देना चाहती हूं. एक दर्दनाक नतीजा उस सफर को परिभाषित नहीं कर सकता, जो मेरे लिए इतना मायने रखता है.'
सिंधु की बातों में हार का दर्द साफ था, लेकिन उससे ज्यादा साफ थी जीत की भूख. 31 साल की उम्र में भी वह कोर्ट पर अपना सबकुछ देने की इच्छा को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं.
उन्होंने कहा, 'मैं दुखी हूं, लेकिन यह ठीक है. मुझे खुशी है कि आज भी यह मेरे लिए इतना मायने रखता है कि इतनी चोट पहुंचती है. मैं अब भी इसे चाहती हूं. मैं अब भी कोर्ट पर अपना सबकुछ देती हूं. यही भावना मुझे आगे बढ़ाती है.'
और फिर आता है इस हार का सबसे अहम पहलू. सिंधु सिर्फ मानसिक रूप से ही नहीं, शारीरिक रूप से भी बेहद कठिन कार्यक्रम से गुजर रही थीं.
उन्होंने बताया, 'तीन मैच 18 घंटे में. रात तीन बजे वापस आई और सुबह 8:30 बजे फिर बाहर थी. इसका असर पड़ा.'
यानी एक मुकाबले के बाद शरीर को संभालने, आराम करने और अगले मैच के लिए तैयार होने का समय बेहद कम था. इसके बावजूद सिंधु कोर्ट पर उतरीं, लड़ीं और जीत के लिए आखिरी अंक तक कोशिश करती रहीं.
वह इसलिए भी निराश हैं क्योंकि एशियन गेम्स से पहले का कैंप उन्हें भरोसा दे रहा था. उन्हें लग रहा था कि इस बार वह कुछ बड़ा कर सकती हैं.
सिंधु कहती हैं, 'लेकिन कैंप के बाद मुझे हर वजह मिली थी यह विश्वास करने की कि मैं कुछ और हासिल कर सकती हूं. मैं इससे कहीं ज्यादा चाहती थी.'
इसलिए यह सिर्फ क्वार्टर फाइनल की हार का दर्द नहीं है. यह उस उम्मीद के टूटने का दर्द है, जो सिंधु इस टूर्नामेंट में लेकर आई थीं.
फिर भी उन्होंने अपने प्रशंसकों को नहीं भुलाया. जो लोग देर रात तक जागकर उन्हें खेलते देखते रहे, हर अंक पर उनका हौसला बढ़ाते रहे, उनके लिए सिंधु के दिल में खास जगह है.
उन्होंने कहा, “उन सभी का शुक्रिया, जो देर रात तक जागे, चीयर किया और विश्वास किया. मैं भी वे आखिरी तीन अंक हम सबके लिए चाहती थी. मेरे साथ खड़े रहने के लिए धन्यवाद.”
हार सामने थी. थकान शरीर में थी. आंखों में निराशा थी. लेकिन सिंधु की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई.
उनका आखिरी संदेश शायद इस पूरे सफर का सबसे मजबूत हिस्सा है.
एशियन गेम्स का मेडल इस बार सिंधु के हाथ नहीं आया. क्वार्टर फाइनल की हार का दर्द भी कुछ समय तक रहेगा. लेकिन 12 साल के सफर और देश के लिए दिए गए उनके योगदान को एक नतीजा मिटा नहीं सकता.
क्योंकि सिंधु के लिए हार का मतलब रुकना नहीं है. शरीर थक सकता है, दिल टूट सकता है, लेकिन जीत की चाह अभी बाकी है.