DUSU चुनाव में इस विभाग का दबदबा, यश डबास-विजय शंकर से लेकर दीपांशु शोकीन तक... सब यहीं के छात्र

Direct Source Verification: This story is aggregated from India Today (indiatoday.in). Full reporting rights and copyright belong to the primary publisher.
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में हर साल कई नए चेहरे सामने आते हैं, लेकिन एक विभाग ऐसा है, जो लगातार छात्र नेताओं के लिए एक अहम मंच बनकर उभरा है. यह विभाग है बौद्ध अध्ययन, जहां बौद्ध साहित्य, दर्शन और इतिहास से जुड़ी पढ़ाई होती है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में हर साल कई नए चेहरे सामने आते हैं, लेकिन एक विभाग ऐसा है, जो लगातार छात्र नेताओं के लिए एक अहम मंच बनकर उभरा है. यह विभाग है बौद्ध अध्ययन, जहां बौद्ध साहित्य, दर्शन और इतिहास से जुड़ी पढ़ाई होती है.

इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में चार केंद्रीय पदों के लिए मैदान में उतरे 10 उम्मीदवारों में से 7 बौद्ध अध्ययन विभाग से थे. इनमें अध्यक्ष पद के दोनों उम्मीदवार भी शामिल थे. ABVP के यश डबास और NSUI के विजय शंकर मीणा के बीच अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला हुआ. यश डबास ने शनिवार को 24,576 वोट हासिल कर अध्यक्ष पद जीता, जबकि विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले.

वहीं, स्वतंत्र उम्मीदवार दीपांशु शोकीन, जो फिलहाल बौद्ध अध्ययन में स्नातकोत्तर कर रहे हैं, ने 30,615 वोट हासिल कर उपाध्यक्ष पद जीता. इससे पहले 2009 में इसी विभाग के मनोज चौधरी ने संघ के अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की थी और वह आखिरी बार था, जब किसी स्वतंत्र उम्मीदवार ने DUSU के केंद्रीय पैनल में कोई पद जीता था.

इस साल विभाग की मौजूदगी बाकी तीन पदों पर भी रही. NSUI की नम्रता ने सचिव पद के लिए चुनाव लड़ा, जबकि संयुक्त सचिव पद की दौड़ में शामिल तीन छात्रों में NSUI के गोपाल चौधरी और समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव भी बौद्ध अध्ययन विभाग से थे.

हालांकि, इस साल की जीत कोई अलग घटना नहीं थी. पिछले कुछ DUSU चुनावों के नतीजों पर नजर डालने पर भी बौद्ध अध्ययन विभाग के छात्र लगातार विजेताओं में शामिल रहे हैं. 2025 में इसी विभाग के NSUI उम्मीदवार राहुल झांसला ने उपाध्यक्ष पद जीता था, जबकि करण और दीपिका झा ने क्रमशः सचिव और संयुक्त सचिव पद पर जीत दर्ज की थी.

इससे पहले 2024 में NSUI के लोकेश चौधरी, जो बौद्ध अध्ययन में एमए के छात्र थे, ने संयुक्त सचिव पद जीता था. वहीं 2023 में तीन साल के कोविड व्यवधान के बाद हुए पहले DUSU चुनाव में ABVP के तुषार डेडा ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की थी.

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बौद्ध अध्ययन के छात्र चुनाव क्यों लड़ते हैं, बल्कि यह भी है कि DU के सबसे बड़े विभागों में शामिल नहीं होने और किसी स्पष्ट राजनीतिक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में पहचाने नहीं जाने के बावजूद यह विभाग बार-बार छात्रसंघ के सबसे प्रमुख पदों के उम्मीदवार क्यों तैयार करता है.

विभाग के प्रमुख प्रोफेसर कामाख्या नारायण तिवारी के मुताबिक, इसका जवाब राजनीति से ज्यादा पाठ्यक्रम की प्रकृति में छिपा है. उन्होंने कहा कि बौद्ध अध्ययन हर स्ट्रीम के छात्रों के लिए खुला है. विभाग में सीटों की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक है, इसलिए ऐसे छात्रों को भी यहां जगह मिल सकती है, जो दूसरे विशेष विभागों में प्रवेश नहीं ले पाते.

विभाग में करीब 200 सीटें हैं. दाखिला सीयूईटी के जरिए होता है और चयन प्रवेश परीक्षा के स्कोर के आधार पर किया जाता है. इस पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए जरूरी नहीं है कि छात्र ने स्नातक स्तर पर बौद्ध साहित्य की पढ़ाई की हो.

तिवारी के मुताबिक, इससे अलग-अलग शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए यह विषय सुलभ हो जाता है. उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म मूल रूप से मानविकी का विषय है और इसकी बहुत सी बुनियादी शब्दावली भारतीय छात्रों के लिए पहले से परिचित होती है. विज्ञान या वाणिज्य का छात्र भी बिना पहले इसकी पढ़ाई किए इस विषय में दाखिला ले सकता है.

विभाग में राजनीतिक गतिविधियों की मौजूदगी की एक व्यावहारिक वजह भी बताई गई है. ऐसे पाठ्यक्रमों के मुकाबले जिनमें प्रयोगशाला या प्रैक्टिकल काम होता है, इस कोर्स में छात्रों को कक्षा के बाहर ज्यादा लचीलापन मिलता है.

तिवारी ने कहा कि विभाग और राजनीति दो अलग चीजें हैं. छात्रों का दाखिला पढ़ाई के लिए होता है और विभाग की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि वे कक्षाओं में शामिल हों, उपस्थिति पूरी रखें और शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करें. कक्षा के बाद वे क्या करते हैं, यह उनका अपना फैसला है.

उन्होंने इस विचार को भी खारिज किया कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले छात्र नियमित रूप से इस विभाग का इस्तेमाल अस्थायी पड़ाव के तौर पर करते हैं और बाद में पढ़ाई छोड़ देते हैं. तिवारी ने कहा कि ऐसा पहले हुआ होगा, लेकिन मौजूदा समय में यह चलन नहीं है. छात्र अब अपनी एमए पूरी करते हैं और कुछ छात्र नेता आगे चलकर पीएचडी भी कर रहे हैं.

हालांकि, कुछ लोग इस पैटर्न को अलग नजरिए से देखते हैं. NSUI के एक सदस्य ने आरोप लगाया कि विभाग से ABVP उम्मीदवारों की लगातार मौजूदगी उसके भीतर राजनीतिक झुकाव की ओर इशारा करती है. वहीं, ABVP सदस्यों ने इस बात को खारिज किया. उनका कहना था कि चुनाव में उनकी सफलता सालभर चलने वाले संगठनात्मक काम का नतीजा है और इसका उम्मीदवार के पढ़े हुए पाठ्यक्रम से कोई संबंध नहीं है.

सिर्फ आंकड़ों के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि यह विभाग राजनीतिक नेताओं को तैयार करता है. हालांकि, आंकड़े एक लगातार दिखने वाले पैटर्न को जरूर सामने रखते हैं. अपेक्षाकृत छोटा और खुले दाखिले वाला यह स्नातकोत्तर विभाग बार-बार DUSU के राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक प्रमुख मंच बनता रहा है. ऐसे में बौद्ध अध्ययन का यह 'दिलचस्प मामला' शायद किसी विभाग के राजनेता पैदा करने से ज्यादा उस संयोजन से जुड़ा है, जो छात्रों को राजनीति में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल स्थिति देता है. इसमें व्यापक पात्रता, पर्याप्त सीटें और पढ़ाई में लचीलापन शामिल हैं.

Original Source
https://www.aajtak.in/india/news/story/dusu-results-yash-dabas-dipanshu-shokeen-why-student-leaders-choose-du-buddhist-studies-course-ntc-apdy-dskc-2647670-2026-09-20?utm_source=rss
Visit India Today ↗
SHARE STORY:
𝕏 f in

Related Coverage in World