'पैसे नहीं हैं...’ कहने में कैसी शर्म, Gen Z का नया मंत्र बना 'लाउड बजटिंग'!

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'Guys, इस ट्रिप के लिए मेरा इतना बजट नहीं है.' 'बर्थडे गिफ्ट में मैं इतना ही कंट्रिब्यूट कर पाऊंगा.' 'महंगे रेस्टोरेंट की जगह कोई बजट-फ्रेंडली जगह चलते हैं.' अपने दोस्तों के साथ बाहर जाते वक्त हम पहले ये बातें नहीं बोल पाते थे. लेकिन ऐसी बातें अब Gen-Z के बीच उतनी ऑकवर्ड नहीं रही...

'Guys, इस ट्रिप के लिए मेरा इतना बजट नहीं है.' 'बर्थडे गिफ्ट में मैं इतना ही कंट्रिब्यूट कर पाऊंगा.' 'महंगे रेस्टोरेंट की जगह कोई बजट-फ्रेंडली जगह चलते हैं.' अपने दोस्तों के साथ बाहर जाते वक्त हम पहले ये बातें नहीं बोल पाते थे. लेकिन ऐसी बातें अब Gen-Z के बीच उतनी ऑकवर्ड नहीं रहीं. दोस्तों के बीच अपने बजट की बात खुलकर करना अब शर्मिंदगी की वजह नहीं, बल्कि अपनी फाइनेंशियल बाउंड्रीज़ बताने का एक तरीका बनता जा रहा है.

एक वक्त था जब लोग पैसे कम होने या किसी प्लान को अफॉर्ड न कर पाने की बात छिपाने की कोशिश करते थे. लेकिन Gen-Z इस सोच को बदल रहा है. वह बिना किसी गिल्ट के बता रहा है कि कितना खर्च कर सकता है, कहां खर्च करना चाहता है और किस प्लान के लिए उसका बजट इजाजत नहीं देता. इसी खुलेपन को ‘Loud Budgeting’ कहा जा रहा है.

Gen-Z के लिए ट्रैवल का मतलब महंगे होटल में रहना नहीं, बल्कि एक्सपीरियंस पर खर्च करना है. यही वजह है कि कई बार वे लक्जरी होटल्स की जगह सस्ते होटल्स, होम स्टेज और जोस्टल को प्रिफर करते हैं. जेन-जी का लॉजिक भी काफी प्रैक्टिकल है-जब पूरा दिन घूमने, एक्सप्लोर करने या दोस्तों के साथ बाहर बिताना है, तो सिर्फ सोने के लिए महंगे कमरे पर ज्यादा पैसे क्यों खर्च किए जाएं? कम कीमत में स्टेज चुनकर वे अपना बजट बचाते हैं और उसी पैसे को ट्रैवल,फूड, शॉपिंग या एक्टिविटीज पर खर्च करना ज्यादा बेहतर समझते हैं.

लाउड बजटिंग का मतलब सिर्फ पैसे बचाना नहीं, बल्कि अपनी फाइनेंशियल बाउंडरीज को बिना शर्म या गिल्ट के खुलकर बताना है. यानी दोस्तों के प्रेशर में आकर ऐसा खर्च न करना जिसे आप अफॉर्ड नहीं कर सकते. पहले ‘मेरे पास पैसे नहीं हैं’ या ‘मेरा बजट कम है’ कहना कई लोगों को embarrassing लगता था, लेकिन Gen-Z के लिए यह अब एक पर्फेक्टली वैलिड रीजन है.

अगर Gen-Z के पास किसी ट्रिप पर जाने का बजट नहीं है, तो वह सीधे कह सकता है कि वह इतना खर्च नहीं कर सकता. और अगर जाना जरूरी है, तो अपने बजट के हिसाब से सस्ता होटल, शेयर कर गाड़ी या कम महंगी एक्टिविटीज का ऑपशन भी सजेस्ट कर सकता है. यहां मकसद प्लान को खराब करना नहीं, बल्कि उसे अपनी पॉकेट के हिसाब से मैनेज करना है.

ट्रिप और बर्थडे पार्टीज के अलावा रोजमर्रा की दोस्ती में भी इसका असर दिखता है. मान लीजिए पूरा ग्रुप ने 3 हजार का डिनर किया, लेकिन किसी ने सिर्फ 800 रुपए का खाना खाया. Gen-Z अब सिर्फ इसलिए बराबर बिल स्पिलट करने के लिए तैयार नहीं होगा क्योंकि “सब दोस्त हैं”. वह साफ कह सकता है कि उसका हिस्सा अलग कर दिया जाए. इसी तरह महंगे बर्थडे गिफ्ट के लिए बड़ा कंट्रिब्यूशन देने के बजाय वह अपनी केपैसिटी के हिसाब से अमाउंट तय कर सकता है. और अब तो इसके लिए बहुत सारी एप्स भी हैं ही, इसलिए Gen-Z का रूल है कि शर्माना नहीं है, लॉजिक लगाना है. 

सोशल मीडिया ने FOMO को और बढ़ाया है. दोस्तों की ट्रिप्स, कॉन्सर्ट्स और महंगे डिनर्स देखकर हर प्लान में शामिल होने का प्रेशर बनता है. लेकिन Gen-Z अब हर ट्रेंड या हर आउटिंग को फॉलो करने के बजाय यह सोचने लगा है कि क्या यह सच में मेरे बजट में है और क्या मैं इस पर पैसा खर्च करना चाहता हूं? लाउड बजटिंग इसी प्रेशर के बीच अपनी फाइनेंशियल बाउंडरीज तय करने का तरीका है.

और नहीं, लाउड का मतलब हर चीज के लिए ‘ना’ कहना या कंजूसी करना नहीं है. इसका मतलब है अपनी priorities के हिसाब से खर्च करना और उसके बारे में दोस्तों के सामने छोटा या ऑकवर्ड महसूस न करना. आखिर Gen-Z का मनी मंत्रा भी जेन जी की तरह काफी सॉर्टेड है-“बजट है तो ठीक, नहीं है तो बोल दो!”

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https://www.aajtak.in/lifestyle/news/story/gen-z-new-money-mantra-understanding-loud-budgeting-and-smarter-spending-habits-vdos-dskc-2642620-2026-09-14?utm_source=rss
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