ओजोन दिवस पर विशेष... संकट में ढाल
हर वर्ष 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है. यह दिवस हमें उस अदृश्य प्राकृतिक सुरक्षा-कवच की याद दिलाता है, जो पृथ्वी से लगभग 15 से 35 किलोमीटर ऊपर समतापमंडल में मौजूद ओजोन परत के रूप में जीवन की रक्षा करता है. सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी-बैंगनी किरणों, विशेषकर यूवी-बी का बड़ा हिस्सा ओजोन अवशोषित कर लेती है.
यदि यह सुरक्षा-कवच कमजोर पड़ जाए तो मानव स्वास्थ्य, वनस्पतियों, कृषि और पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं, लेकिन ओजोन की कहानी केवल आसमान की कहानी नहीं है. इसका संबंध पृथ्वी के उन हिस्सों से भी है, जहां जलवायु परिवर्तन के प्रभाव सबसे स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं. हिमालय उनमें सबसे महत्वपूर्ण है. हिमालय और ओजोन पहली नजर में दो अलग-अलग विषय लगते हैं- एक आकाश की ऊंचाइयों में मौजूद गैस की परत और दूसरा धरती पर फैली विशाल पर्वत-श्रृंखला.
लेकिन जलवायु विज्ञान बताता है कि पृथ्वी की वायुमंडलीय और पर्वतीय प्रणालियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं. ओजोन में परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता, तापमान में बदलाव, वायुमंडलीय परिसंचरण और हिमालयी जलवायु- इन सबके बीच जटिल संबंध हैं.
ओजोन ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना अणु है, इसकी वायुमंडल में इसकी मात्रा बहुत कम है, लेकिन इसका महत्व अत्यंत बड़ा है. समतापमंडलीय ओजोन सूर्य की पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाए रखने में मदद करता है. 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि मानव गतिविधियों से उत्सर्जित क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) जैसे रसायन समतापमंडल में पहुंचकर ओजोन के विनाश में योगदान कर रहे हैं.
इसके बाद 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अस्तित्व में आया. यह पर्यावरणीय कूटनीति की सबसे महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक माना जाता है. इस अंतरराष्ट्रीय समझौते ने ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को नियंत्रित किया. वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार ओजोन परत धीरे-धीरे पुनर्प्राप्ति की दिशा में है और अगर वर्तमान वैश्विक नीतियां जारी रहती हैं, तो आने वाले दशकों में ओजोन परत के 1980 के स्तरों के करीब लौटने की संभावना है.
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि वैश्विक पर्यावरणीय संकट को वैज्ञानिक सहयोग, राजनीतिक इच्छाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पर्यावरणीय चुनौतियां समाप्त हो गई हैं.
हिमालय को अक्सर एशिया का जलस्तंभ कहा जाता है. इसकी बर्फ और हिमनद सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों को जल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. करोड़ों लोगों की कृषि, पेयजल, ऊर्जा और आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिमालयी जल प्रणालियों से जुड़ी है. लेकिन हिमालय तेजी से बदल रहा है. बढ़ते तापमान के कारण अनेक हिमनद पीछे हट रहे हैं. कई क्षेत्रों में हिमपात के स्वरूप में परिवर्तन देखा जा रहा है.
हिमनद झीलों का विस्तार, अचानक बाढ़, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं पर्वतीय समुदायों के लिए नए जोखिम पैदा कर रही हैं. नेपाल, भारत, भूटान और पाकिस्तान सहित पूरे हिंदुकुश हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता. पर्वतों में होने वाला परिवर्तन नदियों के माध्यम से मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचता है. यही कारण है कि हिमालय को केवल भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक विशाल जलवायु और पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में देखना होगा.
यहां वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है. हिमालय के हिमनदों के पिघलने का सीधा कारण ओजोन परत का क्षरण नहीं है. हिमालय में वर्तमान ग्लेशियर ह्रास का प्रमुख कारण क्षेत्रीय और वैश्विक तापमान वृद्धि, बदलते हिमपात, ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषकों और अन्य जलवायु कारकों का सम्मिलित प्रभाव है. फिर भी ओजोन और हिमालय एक व्यापक वायुमंडलीय प्रणाली के दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं. ओजोन एक ओर सूर्य के विकिरण और समतापमंडलीय तापीय संरचना को प्रभावित करता है, वहीं ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि पृथ्वी की निचली वायुमंडलीय परतों को गर्म करती है.
वायुमंडल की अलग-अलग परतों में होने वाले ये परिवर्तन वायुमंडलीय परिसंचरण और क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित कर सकते हैं. हिमालय जैसी ऊंची पर्वत-श्रृंखलाएं स्वयं वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करती हैं. इसलिए ओजोन, जलवायु परिवर्तन और हिमालय के बीच संबंध को किसी एक कारण और एक परिणाम के रूप में नहीं, बल्कि पृथ्वी प्रणाली के परस्पर जुड़े घटकों के रूप में समझना अधिक वैज्ञानिक होगा.
ओजोन संकट ने हमें यह सिखाया कि मानव द्वारा छोड़े गए रसायन पृथ्वी की ऐसी प्राकृतिक प्रणालियों को प्रभावित कर सकते हैं, जिनका अस्तित्व करोड़ों वर्षों से है. जलवायु परिवर्तन इसी चेतावनी को और व्यापक रूप देता है. आज कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा पृथ्वी की ऊर्जा-संतुलन प्रणाली को प्रभावित कर रही है. इसके परिणामस्वरूप तापमान बढ़ रहा है और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र बदल रहे हैं. हिमालय में इसका अर्थ है- बर्फ और हिमनदों का तेजी से बदलना, जल उपलब्धता में अनिश्चितता और आपदाओं का बढ़ता जोखिम.
यदि ग्लेशियर पीछे हटते हैं और हिमनद झीलों में पानी बढ़ता है, तो कुछ परिस्थितियों में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनद झील के अचानक फटने से विनाशकारी बाढ़ आ सकती है. दूसरी ओर अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन पर्वतीय बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं. इसलिए हिमालय की रक्षा केवल वृक्षारोपण का विषय नहीं है. यह जलवायु विज्ञान, आपदा प्रबंधन, जल सुरक्षा, ऊर्जा नीति और सीमा-पार सहयोग का विषय भी है.
हिमालय भारत और नेपाल को अलग नहीं करता, बल्कि जोड़ता है. दोनों देशों की नदियां, पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र और जलवायु जोखिम एक-दूसरे से जुड़े हैं. नेपाल के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाला हिमनद परिवर्तन या अत्यधिक वर्षा भविष्य में नदी प्रवाह और बाढ़ के जोखिम को प्रभावित कर सकता है. भारत के हिमालयी राज्यों- जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भी पर्वतीय आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है. भूस्खलन मानचित्रण और आपदा संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान शामिल होना चाहिए. हिमालय की कोई आपदा राजनीतिक सीमा देखकर नहीं रुकती. पानी भी सीमा नहीं पहचानता और जलवायु परिवर्तन भी नहीं.
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल से मिली सफलता हमें एक महत्वपूर्ण सबक देती है. पर्यावरणीय संकट के सामने वैज्ञानिक जानकारी को नीति में बदलना संभव है. ओजोन-क्षयकारी पदार्थों पर नियंत्रण ने न केवल ओजोन परत की सुरक्षा में योगदान दिया, बल्कि कई ऐसे पदार्थों के उत्सर्जन को भी कम किया, जिनका जलवायु पर प्रभाव पड़ता था.
आज आवश्यकता उसी भावना को जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की है. हमें जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटानी होगी, अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा, ऊर्जा दक्षता बढ़ानी होगी, वनों और हिमालयी पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करनी होगी और प्रदूषणकारी ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को कम करना होगा. विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में विकास की ऐसी नीति चाहिए, जिसमें सड़क, सुरंग, जलविद्युत और पर्यटन परियोजनाओं की योजना बनाते समय पर्वतीय पारिस्थितिकी की वहन क्षमता को प्राथमिकता मिले.
आज हमारे पास वे वैज्ञानिक और तकनीकी साधन उपलब्ध हैं, जिनसे हिमालय में हो रहे बदलावों को पहले से बेहतर समझा जा सकता है. उपग्रह पृथ्वी की सतह और हिमनदों में होने वाले बदलावों की निगरानी कर सकते हैं. रिमोट सेंसिंग, ड्रोन, स्वचालित मौसम केंद्र, हिमनद निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडल भविष्य के जोखिमों का आकलन करने में मदद कर सकते हैं.
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और पृथ्वी-अवलोकन उपग्रहों का उपयोग हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ, जल संसाधन, भूमि उपयोग, वनस्पति और आपदाओं की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण है. लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके आंकड़ों को स्थानीय समुदायों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जाए. हिमालय को केवल उपग्रह की तस्वीरों से नहीं समझा जा सकता. उसे वहां रहने वाले लोगों, उनकी नदियों, जंगलों, चरागाहों और जीवन-पद्धति के साथ समझना होगा.
16 सितंबर केवल ओजोन परत की रक्षा का दिवस नहीं है. यह मानवता के लिए सामूहिक पर्यावरणीय जिम्मेदारी का स्मरण दिवस भी है. कुछ दशक पहले दुनिया ने ओजोन संकट को गंभीरता से लिया. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी, देशों ने समझौता किया, उद्योगों ने तकनीक बदली और समाज ने सहयोग किया. आज ओजोन परत की स्थिति में सुधार की उम्मीद उसी सामूहिक प्रयास की उपलब्धि है. अब पृथ्वी के सामने अगली बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन है. हिमालय इस चुनौती का जीवंत संकेतक है. यदि पहाड़ों की बर्फ बदल रही है, यदि ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, यदि वर्षा का स्वरूप असामान्य हो रहा है और यदि आपदाओं का जोखिम बढ़ रहा है, तो यह केवल हिमालय की समस्या नहीं है.
यह उन करोड़ों लोगों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है, जिनकी जिंदगी हिमालय से निकलने वाली नदियों पर निर्भर है. ओजोन हमें ऊपर आसमान की ओर देखने की सीख देता है और हिमालय हमें धरती की ओर देखने की. दोनों मिलकर एक ही संदेश देते हैं- पृथ्वी की कोई भी प्राकृतिक प्रणाली अलग-थलग नहीं है. आज आवश्यकता भय पैदा करने की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझ और जिम्मेदार कार्रवाई की है. ओजोन परत की रक्षा में दुनिया ने दिखाया है कि सही समय पर लिया गया सामूहिक निर्णय भविष्य बदल सकता है. अब वही संकल्प हिमालय और जलवायु के लिए चाहिए. क्योंकि हिमालय की बर्फ केवल पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ नहीं है. उसमें एशिया की नदियों का भविष्य, करोड़ों लोगों की जल-सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों की जीवन-व्यवस्था छिपी है. ओजोन की रक्षा आसमान को सुरक्षित करती है और हिमालय की रक्षा धरती के भविष्य को. दोनों की सुरक्षा अंततः मानवता की सुरक्षा है.

