'उल्टी से डर लगता था, तो अबोर्शन करवा लिया', महिला ने सुनाई अपनी प्रेग्नेंसी की स्टोरी
प्रेग्नेंसी की खबर सुनकर ज्यादातर कपल्स खुश होते हैं. लंबे समय से बच्चे का इंतजार कर रहे हों तो यह पल उनके लिए और भी खास होता है. लेकिन ब्रिटेन की ब्रायोनी ट्वाइडल के लिए प्रेग्नेंट होना खुशी के बजाय डर और घबराहट लेकर आया. वजह थी उनकी उल्टी से जुड़ी ऐसी फोबिया, जिससे वह करीब 25 साल से जूझ रही थीं.
द सन की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रायोनी को उल्टी से इतना ज्यादा डर लगता था कि किसी दूसरे व्यक्ति को उल्टी करते देखकर उन्हें पैनिक अटैक तक आ जाता था. प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में लगातार जी मिचलाने की समस्या ने उनके पुराने डर को फिर से बुरी तरह बढ़ा दिया. हालात यहां तक पहुंच गए कि उन्हें अपनी जिंदगी खत्म करने जैसे ख्याल आने लगे.
आखिरकार, प्रेग्नेंसी के आठवें हफ्ते में उन्होंने अबोर्शन कराने का फैसला किया. यह फैसला उनके और उनके पति दोनों के लिए बेहद मुश्किल था, क्योंकि वे इस बच्चे को चाहते थे. करीब दो साल बाद ब्रायोनी ने अपनी कहानी इसलिए साझा की है, ताकि ऐसी ही परेशानी से जूझ रही दूसरी महिलाएं खुद को अकेला न समझें.
बचपन से ही था उल्टी का डर ब्रायोनी बताती हैं कि उन्हें ठीक से याद नहीं कि उल्टी से डर कब शुरू हुआ. लेकिन आठ साल की उम्र की एक घटना उन्हें आज भी याद है. वह अपनी मां की कार की पिछली सीट पर बैठी थीं, तभी उनके एक दोस्त ने उनके सामने उल्टी कर दी.
इसके बाद परिवार के साथ सफर के दौरान उनके भाई को होने वाली ट्रैवल सिकनेस ने भी इस डर को और बढ़ाया. धीरे-धीरे उल्टी से बचना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया. वह थीम पार्क जाने से बचती थीं और शराब पीने से भी परहेज करती थीं, ताकि उन्हें खुद उल्टी न हो. अगर किसी सोशल इवेंट में जाने से पहले उन्हें पता चल जाता कि वहां किसी को हाल ही में नोरोवायरस हुआ था, तो वह कार्यक्रम में जाना ही छोड़ देती थीं. ब्रायोनी को सिर्फ दूसरे लोगों के उल्टी करने से ही डर नहीं लगता था, बल्कि खुद बीमार होकर उल्टी करने का भी उन्हें बहुत डर था.
क्या है इमेटोफोबिया? उल्टी के इस असामान्य और बेहद तेज डर को इमेटोफोबिया कहा जाता है. ब्रायोनी के मुताबिक, उन्हें लंबे समय तक लगता था कि शायद वह अकेली हैं जिन्हें इस तरह का डर है.
बाद में जब उन्हें इसके बारे में पता चला तो उन्हें मालूम हुआ कि वह अकेली नहीं हैं. उनके मुताबिक, अनुमान है कि करीब 2 से 7 फीसदी लोगों को किसी न किसी स्तर पर इमेटोफोबिया हो सकता है. इनमें महिलाओं की संख्या काफी ज्यादा बताई जाती है और यह डर अक्सर बचपन के आसपास शुरू हो जाता है.
ब्रायोनी ने इस डर को काबू करने की कोशिश भी की. करीब 20 की उम्र के आखिरी वर्षों में उन्होंने NHS के जरिए CBT यानी कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी ली. थेरेपी के दौरान उन्हें धीरे-धीरे उस चीज का सामना कराया गया जिससे वह सबसे ज्यादा डरती थीं.
शुरुआत में उन्हें एक रोलरकोस्टर पर उल्टी करती लड़की का वीडियो दिखाया गया. वीडियो देखते हुए वह रोने लगीं और उन्हें पैनिक अटैक आया. लेकिन उन्होंने वही वीडियो बार-बार देखा और धीरे-धीरे उनका डर कम होने लगा. इसके बाद उन्हें एक कार में बैठकर उल्टी जैसी दिखने वाली चीज के साथ अपने डर का सामना करने की एक्सरसाइज भी कराई गई.
जनवरी 2024 में शादी के करीब दो साल बाद ब्रायोनी को लगा कि अब वह मानसिक रूप से बच्चे के लिए तैयार हैं. उन्होंने और उनके पति ने परिवार बढ़ाने की कोशिश शुरू की. लेकिन इसी दौरान उनकी जिंदगी में कई परेशानियां भी आईं. मार्च में उन्हें पता चला कि उनके पिता को आंत का कैंसर है और उनकी दादी को ब्रेस्ट कैंसर है.
इसी दौरान उनके पति एक वीकेंड पर दोस्तों के साथ बाहर गए हुए थे और ब्रायोनी को नोरोवायरस हो गया. वह परिवार के दूसरे लोगों को संक्रमित नहीं करना चाहती थीं, इसलिए अकेले ही बीमारी से जूझने की कोशिश करती रहीं. लेकिन करीब 24 घंटे बाद उन्होंने अपने पति से घर लौटने को कहा.
बचपन के बाद पहली बार उन्हें इतनी ज्यादा उल्टी हुई कि वह खुद को रोक नहीं पाईं. करीब पांच बार उन्हें उल्टी हुई. लेकिन इस बार उन्हें कुछ अलग महसूस हो रहा था. उल्टी और मितली की समस्या जैसे खत्म ही नहीं हो रही थी. तभी उन्हें पता चला कि उनका पीरियड करीब दो हफ्ते लेट है. वह प्रेग्नेंट थीं.
ब्रायोनी ने जैसे ही परिवार को प्रेग्नेंसी की खबर दी, सभी बहुत खुश हुए. परिवार पहले ही कई मुश्किलों से गुजर रहा था और ब्रायोनी चाहती थीं कि यह खबर सबके लिए खुशी लेकर आए. लेकिन उनके मन में कुछ और ही चल रहा था.
उन्हें डर था कि प्रेग्नेंसी के साथ होने वाली मॉर्निंग सिकनेस कहीं उनके पुराने इमेटोफोबिया को फिर से न जगा दे. उन्होंने लगातार जी मिचलाने से बचने के लिए रात के दो बजे तक बैगल्स और अंगूर खाने जैसी चीजें भी आजमाईं. उल्टी भले ही नहीं हो रही थी, लेकिन लगातार तेज मितली उन्हें परेशान कर रही थी.
प्रेग्नेंसी के सातवें हफ्ते में उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि वह डॉक्टर के पास पहुंचीं. वह मदद चाहती थीं, लेकिन उनके मुताबिक उन्हें उस समय एंटी-सिकनेस दवा नहीं दी गई और अदरक आजमाने की सलाह दी गई. ब्रायोनी के लिए यह काफी निराशाजनक था.
लगातार डर, मितली और नींद की कमी ने उनकी मानसिक हालत को और खराब कर दिया. ब्रायोनी बताती हैं कि उन्हें लगने लगा था कि वह अब आगे नहीं चल पाएंगी. उनके पति ने भी महसूस किया कि उनकी हालत गंभीर होती जा रही है. उन्होंने क्राइसिस हेल्पलाइन से संपर्क किया, लेकिन उन्हें लगा कि वहां मौजूद लोग इमेटोफोबिया और उनकी स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे थे.
तभी उनके पति ने उनसे कहा कि उन्हें इस प्रेग्नेंसी को जारी रखने के लिए खुद को मजबूर करने की जरूरत नहीं है. उनका कहना था कि ब्रायोनी की सुरक्षा सबसे पहले है. अबोर्शन का विकल्प सामने रखना बच्चे को लेकर कोई दबाव नहीं था, बल्कि उनकी हालत को देखते हुए एक रास्ता था.
ब्रायोनी के लिए यह सुनना बेहद मुश्किल था. वह इस बच्चे को चाहती थीं. प्रेग्नेंसी प्लान की गई थी और दोनों पति-पत्नी परिवार शुरू करना चाहते थे. लेकिन उनकी मानसिक हालत तेजी से बिगड़ रही थी.
मार्च 2024 में, प्रेग्नेंसी के करीब आठवें हफ्ते में ब्रायोनी ने अबोर्शन कराने का फैसला किया. वह बताती हैं कि क्लिनिक में मौजूद स्टाफ ने उनका पूरा साथ दिया. वह वहां बैठकर रो रही थीं और खुद को लेकर शर्म महसूस कर रही थीं. स्टाफ ने उनसे बार-बार पूछा कि क्या वह इस फैसले को लेकर निश्चित हैं.
लेकिन ब्रायोनी को लग रहा था कि उनके पास दूसरा रास्ता नहीं बचा है. अबोर्शन के बाद कुछ दिनों में उनकी लगातार रहने वाली मितली खत्म हो गई. उन्हें लगा कि उनका दिमाग फिर से सामान्य स्थिति में लौट रहा है.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि दर्द खत्म हो गया. वह उस बच्चे के खोने का दुख भी महसूस कर रही थीं, जिसे वह और उनके पति दोनों चाहते थे. ब्रायोनी कहती हैं कि उनके लिए यह फैसला सही था, लेकिन इससे बच्चे को खोने का दुख कम नहीं हुआ.
बाद में भी डर से लड़ने की कोशिश जारी रखी अबोर्शन के बाद ब्रायोनी के मन में शर्म और अपराधबोध बना रहा. उन्हें डर था कि अगर लोगों को उनकी कहानी पता चली तो वे उन्हें जज करेंगे. इसके बाद उन्होंने हिप्नोथेरेपी और CBT की मदद ली.
एक बार तो उन्होंने ऐसी एक्सरसाइज भी की जिसमें उन्हें एक कुर्सी पर घुमाया गया और ज्यादा से ज्यादा नींबू पानी पिलाया गया, ताकि मितली जैसी भावना पैदा हो और वह अपने डर का सामना कर सकें.
फिर 2025 में उनकी मुलाकात थेरेपिस्ट सैली बेकर से हुई. ब्रायोनी के मुताबिक, उन्होंने पहले उनकी एंग्जायटी पर काम किया और फिर प्रेग्नेंसी के दौरान आए विचारों और भावनाओं को समझने में मदद की.
उन्होंने टीवी मेडिक डॉ. निगहत आरिफ से भी बात की. ब्रायोनी के मुताबिक, डॉक्टर ने बताया कि उनकी स्थिति में उन्हें एंटी-सिकनेस दवाओं की मदद मिल सकती थी. उन्हें प्रेग्नेंसी सिकनेस सपोर्ट नाम की संस्था के बारे में भी पता चला, जो प्रेग्नेंसी के दौरान गंभीर सिकनेस से जूझ रही महिलाओं की मदद करती है.
फिर दोबारा प्रेग्नेंट हुईं, इस बार दवाएं भी मिलीं इन तमाम अनुभवों के बाद ब्रायोनी और उनके पति ने दोबारा बच्चा प्लान करने का फैसला किया. इस साल की शुरुआत में वह फिर प्रेग्नेंट हुईं. उस वक्त उनकी उम्र 36 साल थी.
इस बार भी प्रेग्नेंसी का पहला ट्राइमेस्टर आसान नहीं था. पुराने डर बार-बार सामने आ रहे थे और उन्हें चिंता थी कि कहीं पिछली कहानी फिर से न दोहराई जाए. लेकिन इस बार उन्होंने अलग-अलग डॉक्टरों और एक ऑब्स्टेट्रिशियन से मदद ली. उन्हें जरूरत के मुताबिक एंटी-सिकनेस दवाएं मिलीं.
पहले 12 हफ्ते उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद मुश्किल रहे. कई बार वह रोईं और डर भी लगा. लेकिन मेडिकल सपोर्ट और दवाओं की मदद से वह इस दौर से निकल गईं. अब वह अपनी प्रेग्नेंसी के दूसरे ट्राइमेस्टर में हैं.ब्रायोनी मानती हैं कि वह कभी-कभी सोचती हैं कि अगर पहली प्रेग्नेंसी जारी रहती तो आज क्या होता. लेकिन फिलहाल उनका ध्यान अपनी मौजूदा प्रेग्नेंसी और आने वाले बच्चे पर है.
'मदद मांगने में शर्म नहीं करनी चाहिए' ब्रायोनी की कहानी सिर्फ अबोर्शन की कहानी नहीं है. यह एक ऐसे डर की कहानी भी है, जो किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है. वह चाहती हैं कि इमेटोफोबिया या गंभीर प्रेग्नेंसी सिकनेस से जूझ रही महिलाएं अपनी परेशानी को छिपाएं नहीं.
उनका कहना है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं है. अगर कोई महिला लगातार उल्टी, मितली, डर या मानसिक परेशानी से जूझ रही है तो उसे डॉक्टर से बात करनी चाहिए और उपलब्ध मेडिकल व मानसिक स्वास्थ्य सहायता के बारे में जानकारी लेनी चाहिए.
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ब्रायोनी के अनुभव में सबसे अहम बात यही है कि प्रेग्नेंसी के दौरान शारीरिक परेशानी और मानसिक तनाव को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता. सही समय पर मदद मिलने से स्थिति को संभालना आसान हो सकता है.
