'जहां के हैं, वहीं भेजे जाएं...', बांग्लादेश के PM ने बताया रोहिंग्या समस्या का समाधान
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने UN जनरल असेंबली में इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका देश नौ साल से ज़्यादा समय से म्यांमार से ज़बरदस्ती विस्थापित 12 लाख से ज़्यादा रोहिंग्या लोगों को शरण दे रहा है. उन्होंने कहा, "घनी आबादी वाला देश होने के नाते, बांग्लादेश का मानना है कि रोहिंग्या संकट की जड़ म्यांमार में है. इसलिए इसका समाधान भी वहीं है. इस समस्या का एकमात्र समाधान विस्थापित रोहिंग्या लोगों की उनके देश म्यांमार में जल्द और सुरक्षित वापसी है."
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मानवीय सहायता जारी रखने और उनकी सुरक्षित वापसी की दिशा में काम करने का आग्रह किया.
गुरुवार को UN जनरल असेंबली के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए रहमान ने कहा, "इस स्थिति ने हमारे संसाधनों, पर्यावरण, सुरक्षा और स्थानीय समुदायों पर भारी दबाव डाला है."
1970 के दशक के आखिर से बांग्लादेश म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों के कई जत्थों को पनाह देता रहा है.
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी UNHCR के मुताबिक अभी बांग्लादेश में 12 लाख से ज़्यादा रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं, जिनमें से ज़्यादातर कॉक्स बाज़ार इलाके के कैंपों में हैं. इनमें से बड़ी संख्या में लोग अगस्त 2017 के बाद आए जब बड़े पैमाने पर हिंसा और मानवाधिकारों के उल्लंघन के बीच सेना की कार्रवाई के कारण 7 लाख से ज़्यादा रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन राज्य से भागकर आए थे.
बांग्लादेश का हमेशा से यह कहना रहा है कि रोहिंग्याओं की समस्या का स्थायी समाधान उनकी म्यांमार वापसी में है, जो स्वेच्छा से, सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थायी रूप से हो; जबकि संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि म्यांमार के रखाइन राज्य में हालात अभी ऐसे नहीं हैं कि वे स्थायी रूप से वापस लौट सकें.
बांग्लादेश और संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थियों और उन्हें पनाह देने वाले समुदायों के लिए लगातार अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया है.
PM रहमान ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे विस्थापित रोहिंग्याओं के लिए जीवन बचाने वाले सहायता कार्यक्रम तब तक जारी रखें, जब तक कि उन्हें म्यांमार वापस नहीं भेजा जा सकता.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता रहमान ने कहा, "अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय विस्थापित रोहिंग्या लोगों को न्याय दिलाने में नाकाम रहता है, तो निकट भविष्य में यह एक मानवीय संकट का रूप ले सकता है."


