यूपी चुनाव पर SP-कांग्रेस से नहीं मिला जवाब, बोले ओवैसी- 'जबरदस्ती गठबंधन नहीं होता'
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ 2026' के मंच पर AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने देश की मौजूदा राजनीति, अल्पसंख्यकों की स्थिति, कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की नीतियों पर खुलकर बात रखी. ओवैसी ने कहा कि देश में आजादी के बाद से शासन करने वाली सरकारों ने मुस्लिम समुदाय को केवल एक 'वोट बैंक' की तरह इस्तेमाल किया है और उन्हें कभी भी एक स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक नेतृत्व विकसित करने का अवसर नहीं दिया.
ओवैसी ने स्पष्ट किया कि उन्हें भारत के संविधान और इसके सिद्धांतों पर पूरा भरोसा है, लेकिन देश पर राज करने वाली सरकारों ने अल्पसंख्यकों के साथ न्याय नहीं किया, उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने भारत में ही रहने का फैसला किया था क्योंकि वे 'दो-राष्ट्र के सिद्धांत' में विश्वास नहीं रखते थे. संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 और 30 हर नागरिक को समानता और अधिकार देते हैं, लेकिन नेहरू से लेकर मोदी तक की सरकारों ने मुसलमानों को राजनीतिक रूप से शक्तिहीन बनाए रखा, जिसके कारण आज डेटा के अनुसार मुस्लिम समुदाय शिक्षा, अर्थशास्त्र और सामाजिक सूचकांकों में सबसे निचले पायदान पर खड़ा है.
जब ओवैसी से सवाल किया गया कि मुस्लिम समुदाय फिर भी अक्सर कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट क्यों देता है, तो उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने हमेशा 'दो बुराइयों में से कम बुरी' पार्टी को चुना है क्योंकि उनके पास कोई अन्य व्यावहारिक विकल्प मौजूद नहीं था, उन्होंने बताया कि आज संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बहुत कम रह गया है. एक तरफ जहां भाजपा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट न देकर उन्हें पूरी तरह दरकिनार करती है, वहीं दूसरी तरफ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल मुसलमानों को सिर्फ यह कहकर डराते हैं कि भाजपा उन्हें खत्म कर देगी, इसलिए उन्हें इस बात के लिए आभारी होना चाहिए कि ये पार्टियां उन्हें सिर्फ 'जिंदा' रख रही हैं.
RSS प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका में दिए गए बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि "जो हिंदू मुसलमानों को भारत में नहीं देखना चाहता, वह हिंदू नहीं है" पर ओवैसी ने तीखा रुख अपनाया, उन्होंने कहा कि भागवत का यह बयान अमेरिकी विदेश मंत्रालय की धार्मिक स्वतंत्रता पर आई प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद वैश्विक छवि सुधारने का एक छलावा मात्र है. संघ के वैचारिक संस्थापकों जैसे गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय के लेखन का हवाला देते हुए ओवैसी ने कहा कि जब तक ज़मीनी स्तर पर नफ़रत और हिंसा को संघ का समर्थन मिलना बंद नहीं होता, तब तक ऐसे बयानों का कोई अर्थ नहीं है.
कांग्रेस द्वारा AIMIM को अक्सर 'भाजपा की बी-टीम' कहे जाने पर ओवैसी ने कहा कि यह कांग्रेस की अपनी हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने की पुरानी आदत है, उन्होंने याद दिलाया कि 2014 और 2019 में जब भाजपा जीती, तब उनकी पार्टी ने कितनी सीटों पर चुनाव लड़ा था.
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर ओवैसी ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है. उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी का मुख्य उद्देश्य राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को तीसरी बार सरकार बनाने से रोकना है. इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों को गठबंधन करने का खुला प्रस्ताव दिया था, ओवैसी के अनुसार, उन्होंने बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी धर्मनिरपेक्ष दलों को साथ मिलकर चुनाव लड़ने का अवसर दिया था, ताकि हिंदुत्व की राजनीति का मुकाबला किया जा सके.
हालांकि, ओवैसी ने खुलासा किया कि उनके इस प्रस्ताव पर न तो अखिलेश यादव की तरफ से और न ही कांग्रेस नेतृत्व की ओर से कोई सकारात्मक जवाब मिला है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि "चुनाव और गठबंधन में जबरदस्ती नहीं हो सकती, यह दोनों तरफ से होना चाहिए." सपा और कांग्रेस से कोई रिस्पॉन्स न मिलने के बावजूद ओवैसी ने स्पष्ट किया है कि वे पीछे नहीं हटेंगे और संविधान द्वारा मिले अधिकार के तहत उत्तर प्रदेश में चुनाव जरूर लड़ेंगे.
इसके अलावा, बहुजन समाज पार्टी (BSP) या अन्य छोटी पार्टियों (जैसे PDM - पिछड़ा, दलित, मुस्लिम मोर्चा) के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर उन्होंने कहा कि राजनीति में विकल्प हमेशा खुले रहते हैं और आने वाला समय ही तय करेगा कि वे किसके साथ मिलकर मैदान में उतरेंगे.


